Tuesday, August 16, 2011
लोकपाल बिल हिंदी मै यहाँ से प्राप्त करें
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http://www.indiaagainstcorruption.org और इस वेबसाइट पैर लोकपाल के समर्थन मै अन्ना हजारे द्वारा दिया गया जन सन्देश है जो आप प्रिंट करके और ऊसके प्रतियाँ बनाकर सब को बाँट सकते है ,
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देश को भ्रस्टाचार से मुक्त कर ने मैं आप हाथ बटाएं
Saturday, July 24, 2010
मैं और तुम
मन के दरिया मैं मासूम सी लहर उठी है |
पतझड़ मैं उड़ते पत्तों सी तुम यादों के आंगन को भर जाती हो ||
मैं कलियों को चूमता हूँ तुम्हे सोचकर ,और
तुम मुझे सोचकर बालों मैं फूलों को सजाती हो |
मुझे आसमान पे बस एक चांदनी नज़र आती है
तुम चाँद के दाग पर बस नजरें टिकती हो||
मैं पुकारता हूँ की सारा जहाँ सुन सके |
तुम कानों मैं हल्के से बुदबुदाती हो ||
मैं नुमाइश करता हूँ पागलपन की हद तक
और तुम चुप रहती हो छुपाती हो ||
मैं सब कहता हूँ पर जता नहीं पता |
और तुम कुछ नहीं कहती फिर सब जताती हो ||
कोन हो तुम , कोई तुम्हारा नाम तो पूछे |
क्यों किसी अनजान को इतना सताती हो ||
Saturday, July 3, 2010
यूँ न देखो
अब मेरे बिन इक लम्हा गुज़ार के देखो ..
गुमनाम न समझो कुदरत के करिश्मों को .
इल्म की रोशनी है अन्दर ही , इसे बाहर न देखो |
वो जो इक तेरे दर पे बार - बार आता है .
हो तुम भी उस के दीवाने , उसको ही तलबगार न देखो .
वो जो देखता है सब को ऊपरवाला जिसे कहते है .
उसे बैठा कहीं किसी मज़ार पे न देखो ।
Saturday, February 27, 2010
प्रेम रंग की होली
जैसे इक धुन मैं पिरोये कई गीत होते हैं ||
फूलों को जो शोख़, आसमान को संगीन बनाते हैं|
रंगों मैं रंग मिलकर ,और भी रंगीन होते हैं ||
रंगों सा जीवन , जीवन का भी इक रंग है |
सुख मैं थोडा दुख मिला हुआ , कहीं कम , कहीं ज्यादा खिला हुआ है ||
बने मत रहो बेरंग, सब रंगों से मिल जाओ
छुटे न जो सदियों तक कुछ ऐसा रंग लगाओ ||
तन रंग लें , मन रंग लें , जीवन सारा रंग लें ||
आओ अबकी होली प्रेम रंग से खेलें ||
""आओ अबकी होली प्रेम रंग से खेलें""
Friday, December 11, 2009
मतवाली कलि

था भवरा नादाँ मगर फ़िर भी इंकार वो करता था /
भन-भन करता बाग़ों मैं कलियों के पीछे फिरता था //
अधखिली थी कलि मगर, थी कलि बड़ी मतवाली /
कहती है खिलने तो ,देखो सागर है मेरा खाली//
भवरें ने सागर को भरने की फ़िर हर कोशिश कर डाली /
हो उदास भवरें ने फ़िर सागर मैं आँखों से एक बूँद मिला दी //
कहे कलि खिलकर भवरें से मिलकर ,
था बागवान ने सींचा हरपल, थी इसीलिए मतवाली /
था सागर मेरा भरा हुआ ,बस एक बूँद थी खाली //
भवरा वो ले गया उड़कर खिली कलि मतवाली /
जो बड़े जतन से सींच -सींच कर बागवान ने पाली //
Sunday, September 27, 2009
इज़हार

इक बार पहले भी मुझे धोका बहर ये दे चुके
की दोस्ती भी दिल की अपनी दोस्तों मौसम से है //
वो जो कभी न कर सका , वो आज लिख चला हूँ मैं
की आज वो इज़हार लिखना ,लिखने की कसम पे है //
ख़मोश लफ्जों से मुझे कुछ कुछ बुदबुदाना याद है
किसी की याद मैं लिखी ग़ज़ल ,वो मौसम पुराना याद है //
लिखते -लिखते आज मेरे हाथ कुछ नम से हैं
लफ्ज उस वक्त भी कुछ कम से थे , इस वक्त भी कुछ कम से हैं //
Wednesday, August 5, 2009
दिल मेरा मुझपे आ रहा है

क्या समां छा रहा है की दिल मेरा मुझपे आ रहा है |
क्या बात हुई की ख़ुद ही मैं गुनगुना रहा है ||
आइना मुझसे मेरी पूरानी सी सूरत मांगता है /
जवान जिंदादिल मुझसे मेरी पुरनी मूरत मांगता है //
अपने आँचल से उजाला ढक लेती है, चांदनी रात |
कि कपड़े बदलने से नही बदलते हालात //
बदलते मौसम मैं तन्हाई की शाम कहाँ बदलती है |
ये हिज्र शाम रोज़ गमेशब् मैं ढलती है ||
Sunday, July 26, 2009
फ़िर क्यूं दिल घबराता है

सपने कांच टुकडों से पलकों को घायल करते हैं
सुखी आँखों मैं फ़िर आंसूं बनकर क्या बहता है //
रोती हैं आँख या ये दिल रोता है
कैसा रिश्ता ये दिल का पलकों से होता है //
कोन से झरने का पानी ये मन की प्यास बुझाता है /
चोट कही न आए नज़र फ़िर कोन ये दर्द जगाता है //
है नादाँ , हटी ये बात किसी की न माने /
फ़िर भूल के सबकुछ खुश हो जाए कोन इसे समझाता है / /
पा लेता है सबकुछ जो चाहे वो कर के माने /
मिल जाता है सबकुछ , तो फ़िर क्यूं दिल घबराता है //
खा लेता है कस्में फ़िर तोड़ उन्हें वो जाता है /
मेरी बात सही कहता फ़िर क्यूं पीछे पछताता है //
साथ चले दुनिया सारी और भीड़ ही भीड़ नज़र आए /
क्यूं डरता है कभी- कभी , फ़िर ये किस से घबराता है //
Tuesday, July 7, 2009
सपनो की रेत

मजबूर हम इतना हुए की दूर तुमसे हो गए/
पलकों पे जो तेरे ख़ाब थे, वो आंसुओं मैं बह गए//
क्यूं नज़ारे खामोश हुए और फिजायें गुमसुम चली जा रही है/
मेरी सदा जो कह सके ,वो लब्ज़ गूंगे हो गए , //
अब थामकर किस्मत का हाथ मैं सफर पर चल पड़ा /
मेने बनाये थे जो मंजिलों के रास्ते, चलते -चलते रास्ते मैं, रास्ते बदल गए //
प्यार के मोती सभी भरे थे दोनों हाथ से ,था आसमान भी भर लिया /
मुट्ठी खुली जो एक दिन , हाथों मैं हाथ रह गए //
कल थी महफिलों की शाम, भीड़ ही भीड़ बेशुमार थी/
आज मेरा साया और कुछ यादों के साये रह गए //
सपनो की रेत से अपने ही आँचल मैं घरोंदे बना लिए /
खुशियों के आँसू आए तो सरे घरोंदे डाह गए //
सुनते -सुनते दास्ताँ किसी की ,अपनी सी लगी/
कुछ अपनी सुनाई तुझे तो , यार तेरी कह गए //
आज तक मैं हूँ मुझे मुझ पे बड़ा गुमान था /
ख़ुद से नज़र मिली तो ख़ुद बेजुबान हो गए //
Wednesday, March 25, 2009
विरहन

एरी सखी का से कहों मन की बतियाँ
सूने मोरे दिन पुरे , सूनी मोरी रतियाँ |
तोसे मिलूँ तो कहूँ मैं विरहा की बातें
कसे काटें मोरे दिन कैसे मोरी रातें |
सुनरी पवन अगर पी तुझको मिले
कहना भली हूँ पर जी न लगे|
बरसेगा सावन आग मन मैं लगेगी
तरसेगी विरहा प्यासी , बूंदों से जलेगी |
Tuesday, February 10, 2009
फ़िर वही पुरानी बात चली

ढली शुहानी शाम कहीं तो
वही पुरनी बात चली ||
थी दूर गगन के आंचल मैं
वो चाँद रात के साथ पली ||
सुबह ओस की बूंदों के संग
मुझे कली के पास मिली ||
ले हाथों मैं हाथ मेरा वो
कुछ पल मेरे साथ चली ||
फ़िर गुमसुम -गुमसुम ,गुपचुप -गुपचुप
खामोशी से बात चली ||
बात बढ़ी , बढ़ी धड़कन
धड़कन धड़कन के साथ चली ||
फ़िर छोड़ मुझे वो फूल कली
पुरे कर अपने अरमान चली ||
रोक ना पाया मैं उसको
वो किन अपनों के साथ चली ||
फ़िर यादों की पुरवाई चली
वो साल चली दर साल चली ||
अब ढली सुहानी शाम कही तो
वही पुरानी बात चली..||
Friday, January 30, 2009
नजदीकियों से डर लगता है
क्यूंकि उन्हे देखर मेरा चाँद कहीं जा छुपता है !!
मुझे बातों से नही खामोशियों से डर लगता है ,
कोन सी बात है, जो वो अपने ही तक रखता है !!
मुहं फेरकर कोई जाए तो क्यूं कोई शिकबा रहे ,
रूबरू होकर, न कोई सताए , डर लग ता है .!!
नही लगता कोई डर जो लोग दूर से मुकुराते हुए निकले ,
नजदीकियां कोई बढाये तो डर लगता है !!
जमाना जान पे भी हो आमादा , तो कोई डर नही ,
बात जब प्यार की आ जाए तो डर लगता है !!
Tuesday, January 6, 2009
पक्के इरादे से नही
Wednesday, October 8, 2008
"दो पल "

आती साँसों मैं एक जाती सासों मैं एक पल
दो पल बीत रहे हैं आज ,जो बीत गए थे कल|
बीते पल की बात नही होती ,होती दो पल की यादें हैं |
खो जाता हैं वो पल भी जिसमें न खोने की कसमें खाते हैं ||
दो पल कसे अलबेले जो अब तक भूल न पाए |
बनके फूल खिले हर सावन दो पल , फ़िर पतझड़ मैं झड़ जायें ||
ऐसे दो पल भूल न पाए कैसे थे वो पल |
अभी तो सदियों याद करोगे कहते हैं दो पल ||
रात अकेली दिन अकेला , उन दो पल की राह निहारे |
मिल जाए दिन रात से पल मैं , दो पल दिन को रात बना दें||
दो पल आज नही आए , क्या नही आयेंगे कल |
रात मैं चुपके से आ जाते , लोरी गाते दो पल ||
नही प्रवीण कोई , अलग कर सका साथ रहे दो पल |
एक पल उठती पलकों का , झुकती पलकों का एक पल ||
Monday, October 6, 2008
मन की बात

चुप रहें होंट ,कोई आह न निकले ,न कागज़ पे किसी स्याही से लिखा जाए
जो हर साँस कहती है, वो मन की बात ||
कैसे मुस्कुराते है गम ,कोई चीज़ जो छुप नही सकती
चेहरे की शिकन कहती है ,वो मन की बात ||
हुआ खाली मेरा समंदर ,अब आँसू नही निकलते ,
बस पलकों पे नमी रहती है ,कहती है ,वो मन की बात ||
लब्जों की कमी रहती है , हर बात मैं इशारे कहते हैं ,
बखूबी हर नजर कहती है , वो मन की बात ||
कहीं समन्दर तो कही सूखी जमीन है ,इस रेत को भिगो दे लहर कोई ,
हर लहर मैं उठी मोज कहती है । ,वो मन की बात
बिखरे हुए फूल, रुकी हुई हवा ,लोटती हुई लहर ,
कोन सी बहार ऊम्र्भर रहती है क्यूं बार -बार कहती है.वो मन की बात ||
Wednesday, October 1, 2008
जब किसी से कोई गिला रखना

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इस में रोने की जगह रखना
मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना
मिलना जुलना जहाँ ज़रूरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना
Tuesday, September 30, 2008
मुझ से चांद कहा करता है--

मुझ से चांद कहा करता है--
चोट कडी है काल प्रबल की,
उसकी मुस्कानों से हल्की,
राजमहल कितने सपनों का पल में नित्य ढहा करता है,
मुझसे चांद कहा करता है
तू तो है लघु मानव केवल,
पृथ्वी तल का वासी निर्बल,
तारों का असमर्थ अश्रु भी नभ में नित्य बहा करता है,
मुझसे चांद कहा करता है
तू अपने दुख में चिल्लाता,
आँखो देखी बात बताता,
तेरे दुख से कहीं कठिन दुख यह जग मौन सहा करता है
मुझसे चांद कहा करता है
Monday, September 29, 2008
कोई गाता मैं सो जाता !

कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता ।
संसृति के विस्तृत सागर पर
सपनों की नौका के अंदर।।
सुख दुख की लहरों पे उठ गिर
बहता जाता मैं सो जाता ।।
कोई गाता ।।
आंखों में भरकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता, मैं सो जाता ।।
कोई गाता ।।
मेरे जीवन का खारा जल
मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर में मधुमय कर
बरसाता, मैं सो जाता ।।
कोई गाता ।।
Wednesday, August 20, 2008
जो भी मिला अधूरा मिला

खुशियाँ ही मिली न पूरी न गम ही पूरा मिला |
जब भी मिला जो भी मिला अधूरा ही मिला ||
लोंगो ने सींच कर पानी से गुलों को बना लिया गुलशन |
हमने खून और पसीने भी बहाया तो कोई गुल न खिला ||
देकर धोका लोग ये कैसे भरोसा बड़ा लेते हैं |
करके हजारो बफाएं, हमें कभी इक बफा का सिला न मिला ||
अब तो रोती है इक आँख और दूसरी हंसती है |
अपनी मुलाकातों का ये क्या हो गया है सिलसिला ||
जो ख़ुद मैं भरी आग है , क्या कम जलता हूँ|
ओ दूर से आती याद अब और न जला ||
मोसमे पतझड़ है कि हूँ सूखा हुआ सा |
बस अब टूट के गिर जाऊंगा जो और हिला ||
जो तेरी मर्जी ले तू भी करले पूरी |
न शिकायत करेगे हम किसी से , न ही होगी हमें तुझसे कोई गिला||
Monday, August 18, 2008
क्या टूटा है अन्दर-अन्दर
तन्हा-तन्हा रोने वालो, कौन तुम्हें याद आया है
चुपके-चुपके सुलग रहे थे, याद में उनकी दीवाने
इक तारे ने टूट के यारो क्या उनको समझाया है
रंग-बिरंगी महफ़िल में तुम क्यों इतने चुप-चुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगो, क्या खोया क्या पाया है
शेर कहां हैं ख़ून है दिल का, जो लफ़्ज़ों में बिखरा है
दिल के ज़ख़्म दिखा कर हमने महफ़िल को गरमाया है
अब शहज़ाद ये झूठ न बोलो, वो इतना बेदर्द नहीं
अपनी चाहत को भी परखो, गर इल्ज़ाम लगाया है
